A SHORT STORY
शान्ती मार्ग का गब्बरसिंह
‘मुन्ना सिद्दीकी’ कोई बोलता तो शायद कम लोग ही जान पाते। पर उमरिया के शान्ती मार्ग मुहल्ले में सब उसे “गब्बर सिंह” के नाम से जरूर जानते थे।
काली घनी दाढ़ी, बाल बेतरतीब बढ़े हुए, माथे पर काली पट्टी, गले में देवानन्द स्टाईल का रूमाल, कॉलर खड़ी और शर्ट की ऊपर की तीन चार बटनें खुली, शर्ट के दोनो छोर नीचे से गांठ बंधे हुए, बेलबॉटम पर चौड़ी बक्कल का कमर पट्टा और हाई हील वाली चप्पल। मुन्ना सिद्दीकी मतलब गब्बर सिंह का ये हुलिया कोई एक रोज में नहीं बना था, बल्कि लगातार इसमें इजाफा होता गया था। उसकी ठहाकेदार हंसी पर जाने किस ने उसे गब्बर सिंह कहा और बस, तब से मुन्ना सिद्दीकी ने खुद को गब्बर सिंह की तरह देखना शुरू कर दिया। धीरे धीरे ही सही पर उसने गढ़ा अपनी ही तरह का गब्बर।
मुन्ना सिद्दीकी को हम रास्ते से आते जाते ही देखते थे। उसे देखना भी कोई कम रोमांचकारी न था तब। रास्ते में वह किसी से ज्यादा बात न करता था। यही कारण था कि उसका सस्पेंस हमेशा बरकरार रहा। मुहल्ले में लोग भी बच्चों को डराने के लिए गब्बर सिंह का सहारा लेने लगे थे। शोले का वो डायलाग याद होगा ’मां कहती है कि सो जा बच्चे नहीं तो गब्बर सिंह आ जायेगा।’ पर यहां तो सिर्फ नाम लेकर डराने की बात नहीं थी, गब्बर सिंह अपनी शक्लो सूरत के साथ सामने मौजूद था। छोटे बच्चों में जबरदस्त खौफ था उसका।
पर इस खौफ वाले गब्बरसिंह के पीछे मामूली मुन्ना सिद्दीकी था। एकदम मामूली। आठवीं कक्षा में ही स्कूल से बाहर हो जाने वाला मुन्ना, उमरिया कचहरी के सामने पान का टपरा चलाता था। एक माँ और दो बहनों की ज़िम्मेदारी थी उस पर। पान के टपरे पर कचहरी के लोगों का जमावड़ा रहता और रेडियो पर गाने सुनने वाले फोकटिया, टपरे के बाहर पड़ी बेंच पर बैठे ही रहते।
हफ्ते में एक दिन गुरुवार को कालरी खदान से कोयले की लोकल ढुलाई का काम होता था। कालरी के हर एक कर्मचारी को दो बोरी कोयले घरेलू इस्तेमाल के लिए फ्री थे। उनके कोयला कार्ड पर गेट एंट्री होती थी। पाँच रुपए प्रति बोरी के हिसाब से ढुलाई मिलती थी उन दिनों। बहुत से नौजवान इस ढुलाई से रोजगार हासिल करते थे। बहुत मशक्कत का काम था। बोरियाँ खुद भरनी पड़तीं। जी आई तार से बोरी के मुहाने सिलकर साइकिलों में लाद कर घर-घर पहुँचाने के पाँच रुपये प्रति बोरी मिलते थे। ज़्यादातर कालरी कर्मचारियों के घरों में हर सप्ताह दो बोरी कोयले की खपत न थी। सो उनके कार्ड पर गैर कर्मचारी लोग उस कोयले का इस्तेमाल सिगड़ियाँ जलाने और दूसरे घरेलू स्तेमाल में लेते थे। बस उन्हें ढुलाई चुकानी होती थी। मुन्ना सिद्दीकी भी गुरुवार के दिन तीन-चार फेरी लगाकर बीस पाचीस रुपये कमा लेते थे। सिर को कोयले की गर्द से बचाने के लिए कमांडो की तरह कपड़ा बांधा हुआ होता और कोयले के पत्थरों से पैरों को बचाने के लिए गम बूट पहने हुये होते। पेंट शर्ट एकदम कोयले भरे होते। मुंह नाक पर कालिख होती। मुन्ना सिद्दीकी जिंदगी के दोनों रूपों में बराबर खिलता था।
मुन्ना सिद्दीकी सिर्फ शान्ती मार्ग का गब्बर सिंह था। ज्यादातर तो वो पैदल ही निकलता था मुहल्ले से। पर उसने अपनी साइकिल को बड़ी शिद्दत से सजाया था। सुनहरी जरीदार पट्टियां, रंगीन बास्केट, स्पोक्स में मोतियां, मडगार्ड के आगे और पीछे लाल रैगजीन के पट्टे। आगे टीन की तख्ती जिस पर काले रंग से लिखा था ’गब्बर’।
यह पूरी कलाकारी शंकर भाई की थी। शंकर बर्मन, मुन्ना सिददीकी के खास दोस्तों में से थे, जो कि शौकिया पेन्टर थे। मुन्ना सिद्दीकी के घर के ठीक सामने वाली गली में भीतर की तरफ रहते थे। मुहल्ले पड़ोस की दीवारों पर बेल बूटे, चित्रकारी, पोस्टर-बैनर, शादी ब्याह वाले घरों में दीवार पर नगाड़े- शहनाई बनाना और शायरी लेखन शंकर भाई ही करते थे। स्कूली बच्चे, मूलोद्योग परीक्षा के लिए मिट्टी और गत्ते के घर, मोटर गाड़ियां, गुलदस्ते आदि बनवाने के लिए शंकर भाई के पास ही दौड़कर आते। उनकी मण्डली में राकेश, मन्टू, पप्पू, कोद्दू, जित्तू वगैरह भी शामिल थे जो गब्बर सिंह की ’इमेज बिल्डिंग’ के लिए काम करते थे। उनकी बैठकें जमती थीं और प्लानिंग चलती थी। उमरिया कस्बे में शांति मार्ग मुहल्ले की इस युवा जमात की फुर्सत का यह एक रचनात्मक पहलू था। अनजाने ही वो मुन्ना सिद्दीकी को गब्बर सिंह बना बैठे थे। और अब कहानी और किरदार दोनों को बढ़ाते चलना उनकी रचनात्मकता और उसकी खुराक के लिए जरूरी हो गया था।
इसी सिलसिले में शंकर बर्मन ने एक बडे चुनावी पोस्टर के पीछे गब्बर सिंह का पोटरेट बनाया। कमर तक के इस चित्र में खतरनाक चेहरा था, जिसकी घनी दाढ़ी, सिर पर साफा, दोनों कंधों पर बन्दूकें और छाती से क्रास करते हुए कारतूसों के दो पट्टे, कारतूस का एक पट्टा कमर में, सेना की वरदी वाली शर्ट, जिनके कंधों पर फ्लैप, पॉकेटस के ऊपर फ्लैप, बांहे फोल्ड की हुई और उन पर भी फ्लैप। काले रंग से बनाये गये इस पोस्टर को खड़ा करने के लिए उसके चारों तरफ बांस की खपच्चियां मढ़ी गयीं थीं, जिन्हें आपस में जीआई तार से कसकर बांधा गया था।
टीम की सलाह पर तैयार ये पोस्टर मुन्ना सिद्दीकी के घर की अटारी वाली छप्पर के नीचे खिड़की से सटाकर लगाया गया था। पोस्टर ऐसी जगह पर था जो दूर नीम के नीचे वाली सडक से भी दिख सके। अब आते जाते सब की निगाह उस भारी भरकम पोस्टर पर जाती ही थी जिसमें अपनी तरह का गब्बर सिंह बनाया गया था।
गरमियों के दिन आ रहे थे। स्कूल की छुट्टियां शुरू हो गयी थीं। हम दिन भर नीम के नीचे चिरंगे या फिर गिल्ली डण्डे खेलते और रात होते ही टीपरेस हमारा पसंदीदा खेल था। एक शाम हमें जानकारी मिली कि मुन्ना सिद्दीकी की अटारी की छप्पर में चोंगा (स्पीकर) बांधा जा रहा है। हम झोंप लगाकर इकट्ठा हो गये। यह बड़ा रोचक था। नाटक, रामलीला, अखण्ड रामायण, भागवत कथा, और मंदिर संकीर्तन के लिए चोंगे लगते तो देखे थे। मस्जिद में भी एक चोंगा परमानेंट लगा हुआ था। पर यह चोंगा क्यों बांधा जा रहा था ? यह समझ में नहीं आ रहा था।
शंकर भाई और पप्पू ऊपर चढ़े हुए थे। उन्होंनें सामने की तरफ मुंह करके चोंगे को बांधा था। गब्बर के पोस्टर के ठीक ऊपर। अब टेस्टिंग की बारी थी। मण्टू और राकेश इस काम में लगे थे। मण्टू की रेडियो और टेप रिकार्डर रिपेयरिंग की वर्कशाप थी जो उन्होंने घर में ही बना रखी थी। कनेक्शन वगैरह जोड़ के टेप रिकार्डर का प्ले बटन दबाया गया। चोंगा तेजी से गरजा, ’ये....दोस्ती......हम नहीं.........छोडेंगे’.......शोले का मशहूर गीत बजा था उसमें। फिर अचानक बन्द हुआ। कुछ घर्र फर्र की आवाज आयी। शायद कैसेट रिवर्स या फारवर्ड किया गया होगा। चोंगा एक बार फिर गरजा, ’अरे ओ सांभा.......कितना ईनाम रक्खे है रे सरकार हम पर........सरकार, पूरे पच्चास हज्जार....’। चोंगा फिर बन्द हुआ। शायद टेस्टिंग पूरी हो गयी थी और अब कैसेट को एकदम स्टार्टिंग से लगाने के लिए रिवर्स किया जा रहा था। घर्र फर्र की आवाज आ रही थी। बाद में यह तय हुआ कि रात आठ बजे शोले का कैसेट चालू किया जायेगा ताकि फुरसत से रात ग्यारह बजे तक सुना जा सके। जबरदस्त माहौल था मुहल्ले में। हम सब भी इसी गुंताड़े में थे कि कहां बैठकर स्टोरी का मजा लिया जाये। साफ साफ आवाज भी सुनाई दे और आसपास किसी तरह का डिस्टरबेंस भी न हो।
स्टोरी शुरू हुई। सब जहां तहां बैठे हुए शोले का आनन्द ले रहे थे। सब अपनी अपनी हम उम्रों की जमात में थे। शोले का रस बह रहा था और मुहल्ले की रातरानी और मधुमालती की भीनी भीनी खुशबू के बीच हम सब रामगढ़ में गोते लगा रहे थे।
अब तो दिन, दोपहर, शाम, रात बस शोले ही शोले थी। जैसे ही कैसेट पूरा होता, पलट कर फिर लगा दिया जाता। पता नहीं कौन वहीं बैठे बैठे कैसेट पलटने का काम करता। सब तो यहां वहां बैठे स्टोरी सुनते थे। आज तक पता नहीं चला कि ये कौन करता था। शोले की स्टोरी चलती ही रहती। बच्चे बच्चे को एक एक डायलॉग रट गया था। हम सब नीम के नीचे खेलते रहते या गप्पे हांकते रहते और चोंगे से कभी ठाकुर चीखते, कभी गब्बर, कभी जय वीरू की नोकझोंक, अंग्रेजों के जमाने के जेलर की डींगें, शूरमा भोपाली की बतोलेबाजी या फिर बसन्ती की बकबक चलती रहती।
इस बीच गब्बर के पोस्टर के ऊपर लाल रंग की पन्नी में लपेटकर एक लट्टू बल्ब भी लगा दिया गया था। जो गब्बर की उपस्थिति का एहसास देता रहता।
मुहल्ले के बच्चों में मुन्ना सिद्दीकी का रूतबा अब और बढ़ गया था। कभी कभी रूरू महराज के घर के पास पीपल के चौतरे पर मजमा लगता था। गब्बर सिंह बीच में बैठते और चारो तरफ से मुहल्ले भर के लौंडे लफाटी। कुछ छोटे बच्चे डरते भी, लेकिन गब्बर को देखने का ऐसा कौतूहल था कि चाचा, पिता या बड़े भाई की उंगली थाम के मजमें के पास जरूर आते।
मुन्ना सिद्दीकी साइकिल पर अपना रेडियो टांगते और फुल वाल्यूम में गाना बजाते मुहल्ले से गुजरते। गब्बर के आने जाने का पता उनके रेडियो से लग जाता। कितने ही घरों की खिड़कियां खुल जाती थीं उस गब्बर को देखने के लिए। और कुछेक की बंद भी। बंद होने वाली खिड़की मिश्रा जी, रेंजर साब के घर की थी। दरअसल गब्बर सिंह की पूरी कहानी इस खिड़की के इर्द गिर्द बुनी हुई थी। मुन्ना सिद्दीकी का दिल कभी आ गया था इस खिड़की पर टिके एक चेहरे पर। रेंजर साब की बड़ी बेटी ने एक बार मुन्ना सिद्दीकी को बड़ी हिकारत से देखा था और बस मुन्ना सिद्दीकी फिदा हो गए थे उसपर। फिर तो आते जाते उनकी नज़र खिड़की पर जरूर जाती थी। एक बार रास्ते पर आमना- सामना होने पर अँग्रेजी में स्टुपिड कहा था उनको। मुन्ना सिद्दीकी अँग्रेजी पढे लिखे न थे पर रेंजर साब की बेटी के टोन से उन्होने इसका मायना भाँप लिया था। और फिर उनकी दीवानगी बढ़ती गई। गली से आते जाते उन्होने अब एक नया फिल्मी गाना गाना शुरू किया था। “हमरे गाँव वाली गोरिया जब जबान होई, तब हमारा गंगा इस्नान होई”। गंगा इस्नान का इतना अच्छा प्रयोग फिर कभी न हुआ। न तो फिल्मी गीतों में और न असल ज़िदगी में। और जब इस गीत को गाते हुये मुन्ना सिद्दीकी गली से निकलते तो यह खिड़की बंद हो जाती। मुन्ना सिद्दीकी भी बड़े कमाल के फनकार थे। इसके बाद तो उन्होने गीत ही बदल दिया। और गाने लगे “ये खिड़की जो बंद रहती है, मेरी दुश्मन है ये, मेरी उलझन है ये, बड़ा तड़पाती है, दिल को तरसाती है, ये खिड़की जो बंद रहती है”।
रेंजर साब के तबादले के साथ यह सिलसिला भी खत्म हो गया। कोई नहीं जानता कि स्टेशन पर विदा करते वक्त भीड़ में मुन्ना सिद्दीकी भी थे। ट्रेन की उस खिड़की की तरफ देखते हुये एक रेशमी रुमाल लहराया था उन्होने। जो एक बार रास्ते पर गिराया था किसी ने जान बूझकर। वह रेशमी रुमाल बहुत सालों तक मुन्ना सिद्दीकी के गले की शान रहा। पर गब्बर सिंह का स्वांग फिर कभी न धरा उन्होने। जैसे कोई मना कर गया था उन्हें इसके लिए।
सिद्दीकी चच्चा अब तिरसठ साल के हैं। उलझे हुये बाल और सफ़ेद खिचड़ी दाढ़ी वाले चेहरे पर नज़र का चश्मा रहता है। साइकिल अभी भी हमसफर है उनकी। घर से 3-4 किलोमीटर साइकिल चलाकर दुकान आते हैं रोजाना। उमरिया में चपहा कालरी के मुहाने में चाय नाश्ते की एक गुमटी है उनकी। मजमा अभी भी लगता है वहां। पर मजमें का मंजर अब वो नहीं रहा। पगार पाने के बाद खदान मजदूर उनकी गुमटी पर आकर साहूकार के कर्जे का हिसाब किताब करते हैं। चिल्लाचोट भी होती है। दारुखोरों के बीच झगड़ा भी होता है। चाय समोसे बिकते हैं पर अब कोई डरता नहीं उनसे। न कोई गब्बर सिंह के नाम से जानता है उनको। पता नहीं सिद्दीकी चच्चा को भी ठीक तरह याद है कि नहीं कि एक जमाना गब्बर के रूतबे में गुजारा है उनने।
अनिल सिंह
ऑक्टोबर 2024