A SHORT STORY

हीमोटोन और मिनी फ्रिज

उस रोज सुबह से ही दवाओं की परची में एक नाम फिक्स जान पड़ रहा था, ‘हीमोटोन‘। नाम मुझे पहचाना सा लगा। टॉनिक वाले शेल्फ में 9 बॉटल रखी थीं जो बारी बारी से मैंने उठाकर दे दीं। जब थोड़ी मोहलत मिली तो मैंने दूकान की फर्श पर रखे कार्टन्स खोलकर देखे, सबमें हीमोटोन थीं। चारो कार्टन्स पैक थे और हर में 25-25 बॉटल्स थीं। मतलब अभी मेडिकल स्टोर्स में 100 बॉटल्स हीमोटोन की थीं। इतने में ही एक परची और आ गयी। उसमें सिर्फ एक ही दवा लिखी थी और वो थी हीमोटोन। मैंने एक कार्टन में से निकालकर दी और बिल बना दिया। 65 रूपये। उसके बाद मौका पाते ही मैंने वो कार्टन खाली कर दिया और हीमोटोन की सारी बॉटल्स शेल्फ में जगह बनाते हुए जमा दीं।

जमा कर मुड़ा ही था कि एक और परची आ गई। मुन्शी चच्चा थे। उन्होंने पूछा, भईया नहीं आये अभी ? मैंने कहा बस आते ही होंगे। फिर मैंने दवाईयां निकालते हुए पूछा, किसकी तबीयत खराब हो गई चच्चा ? वो बाले षानू को तीन दिन से बुखार आ रहा है। षानू, उनकी बिटिया, 9 वीं में पढ़ती थी। तीन तरह की गोलियों के अलावा चैथी दवा थी हीमोटोन। जब मुन्शी चच्चा चले गये तो मैंने हीमोटोन की एक बॉटल उठायी और यह जानने के लिए कि उसमें क्या क्या है उसका कॉम्पोजीशन पढ़ने लगा। र्साइंस का विद्यार्थी तो था ही, दवाईयों के नॉमेनक्लेचर और फार्मूलों में रूचि भी हो आयी थी। भाई साब के मेडिकल स्टोर्स में बतौर सहायक या यंू कहें कि बतौर रिलीविंग एजेण्ट, मुझे बैठते हुए कोई दो साल हो गये थे। काफी कुछ दवाईयों के नाम और काम जानने समझने लगा था। किसी भी डॉक्टर की परची पढ़ लेने में अब मुझे कोई मुश्किल न थी।

सुबह 7 बजे तक मैं ही आकर मेडिकल स्टोर खोलता। फिर 9 बजे तक भाई साब आ जाते और मेरी छुट्टी। फिर मैं आता दोपहर 2 बजे, तब भाई साब घर जाते। खाना खाके आराम करके वो 4 बजे आ जाते और मेरी फिर छुट्टी। फिर रात में 9- 10 बजे तक भाई साब ही दूकान बन्द करके आते। इसके अलावा ट्रांसपोर्ट सर्विस से दवाइयों के कार्टन पता करना, उठवाकर ठेलों से दूकान भिजवाना और छोटा मोटा कार्टन साइकिल के केरियर में ही रखकर दूकान ले आना, मेरी जिम्मेदारियों के काम थे। इन सब में मुझे मजा भी बहुत आता था।

खाली समय में मैं, दूकान में बैठकर नयी नयी दवाईयों के नाम पढ़ता रहता। जब भी नया कार्टन आता, खोलकर पैकिंग स्लिप से दवाईयों का मिलान करना और उनकी तय जगहों पर उन्हें रखना अमूमन मेरा काम था। कई बार तो एजेण्ट को ऑर्डर लिखाते समय भाई साब को मैं ही दो चार दवाईयों के नाम सुझा देता था कि ये दवाईयां कम बची हैं, मंगा लो। मैं भाई साब से उमर में काफी छोटा ठहरता पर मेडिकल स्टोर्स में मेरी जानकारी और समझ कहीं कम न पड़ती थी।

भाई साब फार्मासिस्ट डिप्लोमा होल्डर थे। ड्रग लाइसेंस उन्हीं के नाम था। बिजली के मीटर के बगल से फ्रेम में जड़े हुए भाई साब की तसवीर वाले उस लाइसेंस की शान ही कुछ और थी। कभी दो तीन रोज के लिए भाई साब जब बाहर जाते तो मैं मेडिकल स्टोर्स सम्भाल लेता था। दोस्तांे का जमावड़ा भी उन दिनों यहीं होता।

बात हीमोटोन की चल रही थी। मुझे ध्यान आया कि ये चार कार्टन तो परसों ही आये हैं। इस कम्पनी का मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव खुद रिक्शे में अपने साथ लेकर आया था। दूकान में बैठा, चाय पी। भाई साब से काफी देर बात की थी। यह भी सुनायी दिया था कि डॉ. द्विवेदी कल से लिखना शुरू कर देंगे। पर क्या, कुछ समझ में नहीं आया था। भाई साब ने उसे सुझाया भी था कि अभी एक ही डॉक्टर रखो।

सुबह, दोपहर, शाम धड़ाधड़ हीमोटोन निकलती गयीं। बच्चे, बूढे, जवान। क्या औरत क्या मर्द। सबकी परचियों में हीमोटोन फिक्स थी। मैं भी हैरान था कि ऐसी क्या कमाल की दवा है जो सबकी तकलीफ दूर कर रही थी। भाई साब से मैंने पूछा तो उन्होंने इतना ही बताया, ‘खून बढ़ाने और ताकत वाली टॉनिक‘ है। सप्ताह भर में चारो कार्टन्स खलास हो चुके थे। मैंने ही चारो खाली कार्टन्स फोल्ड करके बगल वाले कमरे में बने स्टोर में रखे थे। यहां से कबाड़ी तौल के हिसाब से खाली कार्टन्स खरीद कर ले जाता था।

उसी दिन ट्रांसपोर्ट सर्विस की शाम वाली ट्रिप से पांच कार्टन्स और आये। मैंने देखा सब हीमोटोन ही थे। परचियां आ रहीं थीं हीमोटोन जा रहीं थीं। सारी परचियां डॉ. द्विवेदी की थीं। कई बार तो दूकान के काउण्टर पर खडे़ चार पांच लोगों की परचियों पर जब हीमोटीन ही दी जाती तो वे आपस में बातें करने लगते। एक दूसरे से पूछते, आप को क्या तकलीफ है ? उन्हें शायद यह लगता कि दवा एक है तो तकलीफ भी एक ही होगी।

पंद्रह बीस रोज में वो पांचो कार्टन्स भी खाली हो गये। एक बॉटल मेरे हाथ से फूटी भी। सांवला सा मीठा कसैला पानी फैल गया था फर्श पर। चींटियां भी आयीं, पर कुछ खास रूचि नहीं दिखायी उन्होंने। मैंने ही पुराने अखबार डालकर सुखा दिया उसे। बॉटल की गरदन ढक्कन सहित रख दी। अगर ढक्कन की सील न टूटी हो तो कम्पनी में वापसी का प्रावधान था।

एक रोज वही मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव फिर दिखा। भाई साब से बात कर रहा था। डॉ. द्विवेदी का जिक्र भी आया था। कुछ और दवाईयों के ऑर्डर लेकर वो चला गया। अगले रोज भाई साब ने ट्रांसपोर्ट सर्विस में फोन लगाया, कुछ बात हुई। भाई साब ने मुझे कहा, ट्रांसपोर्ट चले जाओ, एक बड़ा कार्टन आया है, उठवाकर डॉ. द्विवेदी के घर रखवाना है।

मैं ट्रांसपोर्ट गया। बिल्टी ली। रिसीव किया। बिल्टी में लिखा था, पाने वाले का नाम- “डाक्टर द्विवेदी, मार्फत सुभाष मेडिकोज उमरिया”, एक नग। केल्विनेटर कम्पनी का मिनी फ्रिज था उस कार्टन में। मैंने बिल्टी का भाड़ा चुकाया और पल्लेदार से ठेले में कार्टन रखवाकर डॉ. द्विवेदी के घर की तरफ चल पड़ा। पहले तो कुछ धुंधला सा था, पर अब हीमोटोन और मिनी फ्रिज का आपसी संबंध मुझे साफ साफ समझ में आ रहा था।