ABOUT ANIL’S BOOKS

मनुष्यता की उम्मीद जगाती कहानियाँ

अनिल सिंह के कहानी संग्रह ‘चमनलाल के पायजामे’ पर

कवि एवं रंगकर्मी हेमंत देवलेकर की टिप्पणी

कहानी स्मृतियों, अनुभवों, घटनाओं और चरित्रों का संग्रह तो होती है लेकिन यह एक बिखरा और फैला हुआ संग्रह होगा जब तक कहानीकार उसमें संवेद्नात्मक और कलात्मक अंतर्दृष्टि से अपने लेखन बिन्दु को स्थिर नहीं करता। इसे यूं भी समझा जा सकता है कि आपके हाथ में कैमरा है और 360 डिग्री पर आसपास का वातावरण, पर हम उसको कहीं एक जगह स्थिर करते हैं और वहाँ भी फोकस- डीफोकस करते रहते हैं। तब ही साफ और चाही गयी तस्वीर बनती है।

तक्षशिला के जुगनू प्रकाशन से इसी वर्ष प्रकाशित अनिल सिंह के पहले कहानी संग्रह ‘चमनलाल के पायजामे’ को पढ़कर एक ताजगी का एहसास होता है। कस्बाई फ्लेवर वाली इन कहानियों में जीवन अपने पूरेपन में जगह पाता है। लेखक की किशोरवय की स्मृतियों का सूत्र पकड़कर बुनी गयी इन कहानियों में बच्चे, नौजवान, प्रौढ़ और बुज़ुर्ग सभी के लिए बराबर आकर्षण और जुड़ाव है।

कहानियों में जीवन के सच्चे और मासूमियत भरे रंग हैं, जिससे सभी उम्र के पाठकों का इनसे सहज जुड़ाव बनता है। इन कहानियों में बचपन की उपस्थिति के कारण, इन्हें खासकर बच्चों- किशोरों को जरूर पढ़ना चाहिए, जो उन्हें भावनात्मक रूप से विकसित करेंगी। आसपास के बदलते माहौल के प्रति संवेदनशील भी बनाएंगी।

‘चमनलाल के पायजामे’ बचपन का एक खूबसूरत दस्तावेज़ है। स्मृतियों के नगीनों से भरा एक सन्दूक। बचपन का एक गाँव है उमरिया, जो अब सभी का अपना गाँव लगता है। अनिल सिंह के लेखन की यह व्यापकता है कि उनके बचपन में सभी पाठकों को अपना बचपन दिखाई देता है। बहुत मौज मस्ती वाला, बिना किसी तनाव वाला। उनकी यादें सभी की यादों को ताज़ा कर देती हैं। हमारे बचपन के साथी गुड्डू मन्नू पप्पू, बबलू घिस्सू थे। नादानियां थीं, मस्ती थी, शरारतें थीं। भोलापन था। बचपन, बचपन की तरह था। पंछी की तरह उड़ता हुआ। इन कहानियों में अपनी स्थानिकता या स्थानीयता को लेकर एक गौरव का अनुभव है। किसी प्रकार का हीनताबोध नहीं है। इन छह कहानियों के संसार में अधिकांश जगह लेखक खुद मौजूद है। उसके आसपास एक कस्बाई माहौल है। ठेठ देहाती परिवेश। इन कहानियों के संसार में शहरी संस्कृति के कोई निशान नज़र नहीं आते। वर्तमान समय की कहानियों में ग्रामीणपन, आंचलिकता नदारद है। हालाँकि इसमें अनिल जी के बचपन की स्मृतियाँ हैं पर उन्होने बिना किसी काट- छांट के पूरी ईमानदारी से (जोखिम के साथ भी कह सकते हैं) उसे जस का तस अभिव्यक्त किया है। वह भी एक कलात्मकता के साथ। लेखक की सच्चाई- ईमानदारी दिखाई देती है जब वे पंडिताने, मुसलमान टोला, लंगड़ा गुड्डा और बनिया गुड्डू जैसे नाम बिना लाग- लपेट के लिखते हैं। बिना किसी औपचारिक भद्रता के। यही खूबसूरती भी है कि हमारे समाज में हमने जो देखा सुना, उसे अभिव्यक्ति मिले। इसमें एक किस्म की पारदर्शिता और सच्चाई है जिसे हम पवित्रता भी कहते हैं।

कहानियों में लेखक का बचपन है। बचपन की स्मृतियाँ हैं। कस्बा उमरिया है, जहां अनिल जी का बचपन बीता। दुनिया को देखने की समझ उन्होने वहां से पायी। कहानियों में बहुत सारे दोस्त हैं। बचपन के बहुत से वयस्क किरदार हैं जिनकी आवाजें, क्रिया कलाप और आदतें इन कहानियों में इस ढंग से उतरी हैं कि लगता है जैसे आज हमारे आसपास ही होंगे वे।

ये कहानियाँ सिर्फ स्मृतियाँ नहीं हैं, सिर्फ बचपन के अनुभव या ब्योरे नहीं हैं। इनमें बहुत गहरी संवेदनशीलता है, सामाजिक सरोकार हैं और हमें दिखाने वाला आईना भी। इन कहानियों की विशेष और विलक्षण बात इनकी भाषा है। खासकर बच्चों, किशोरों के नज़रिये से देखें तो सरल, साफ भाषा। छोटे- छोटे वाक्य और मुहावरों का इस्तेमाल होने से बहुत ज्यादा फैलाव होने से बच गया है और इसलिए कथ्य सीधे पाठक तक पहुँच जाता है। शब्दावली आसपास की है, रोज़मर्रा की है। कहानियों में ग्रामीण और देशज शब्दों की भरमार है जो इन कहानियों को और सजीव बनाते हैं। भाषा वर्णन से भरी हुई है। ये कहानियाँ उपदेश देने से खुद को बचा लेती हैं। अपने सरोकार से लबरेज होने के बावजूद वे कोई नारा या उद्देश्य नहीं बनतीं। बस पाठक का मन उद्वेलित कर देती हैं, वह भी बहुत धीमे से। कहानियों की लंबाई भी अगर बच्चों के संदर्भ में देखें तो ठीक लगती हैं।

किताब की चित्रकार तापोषी घोशाल का बहुत बड़ा योगदान रहा है किताब को सँवारने में। उसे और ज्यादा मूर्त रूप देने में। चित्र बहुत सुंदर, सजीव और एकदम जुड़ाव बनाने वाले हैं। चित्रित पात्र कहानियों में वर्णित पात्र से मेल खाते हैं। वे सब अपने आस पास देखे हुये से लगते हैं इससे पूरी किताब बड़ी आकर्षक हो गई है। कवर पेज का डिटेल्ड चित्र अपनी तरफ खींचता है।

संग्रह की सबसे मार्मिक कहानी है ‘बंदरों की जल समाधि’। गाँव की जमीन जल संग्रहण भूमि में बदल चुकी है। लोग अपने घर- बार छोडकर जा चुके हैं। लेकिन जंगल के पशुओं की किसी को सुध नहीं। उनके व्यवस्थापन की बात किसी ने नहीं सोची। बंदरों का झुंड पेड़ों पर फंसा रह गया है। चारो तरफ पानी ही पानी है। वे भूखे प्यासे, पेड़ों पर चिपके- चिपके सूख जाते हैं ठूंठ हो जाते हैं। विस्थापन के दर्द और उसकी त्रासदी को कई कहानियों और कविताओं में बयां किया गया, मगर जिस जगह लेखक की नज़र गई वो बहुत मार्मिक है। झकझोर कर रख देने वाली है। बंदरों का पेड़ पर सूख जाना, ठूंठ हो जाना एक हृदयद्रावी बिम्ब है। यह कि विस्थापन सिर्फ इन्सानों का नहीं प्रकृति का भी होता है। अनिल जी ने स्मृतियों की तलहटी से ये खोज निकाला है जो उनकी अति संवेदनशील दृष्टि को बताता है।

‘बिजूका’ कहानी में पहलवानों की कद काठी वाले मंगल चाचा हैं और उनका भतीजा शंकर है। मंगल चाचा से अक्सर पिटाई खाने के कारण शंकर के मन में उनकी छवि खलनायक की है। वह उन्हें मज़ा चखाने के लिए उपाय भी ढूँढता है। योजना बनाकर वह एक रात में चाचा को डराने के लिए खेत पहुंचता है और बिजूका में घुस जाता है। शंकर के बिजूका में घुस जाने का बहुत ही रोमांचक वर्णन है। पहलवान कहलाने वाले मंगल चाचा डरकर घर भागते हैं और इस तरह शंकर का बदला पूरा होता है।

‘गज्जू का बाड़ा’ एक बहुत ही सुन्दर कहानी है। एक रहस्यमयी कहानी है। बड़े ही रोचक अंदाज़ में लिखी गई है। एक पुराने बाड़े की दीवार पर बने छेद से झाँकने पर बच्चों को कुछ चमकता हुआ दिखाई देता है... और फिर शुरू हो जाता है नागमणि की मनगढ़ंत बातों का, फैंटेसी का न खत्म होने वाला सिलसिला। लेखक ने रहस्य रोमांच का सीधा, सरल ताना- बाना बुना है। बच्चों के मनोविज्ञान, उनकी कल्पना में झाँकने का अवसर पैदा करती है ये कहानी। फिर खोदा पहाड़ निकली चुहिया के तर्ज़ पर सारा रहस्य धड़ाम से गिर पड़ता है और मिट्टी में मिल जाता है। इस कहानी में अनिल जी ने बच्चों की कल्पनाशीलता, उनकी बाल सुलभ किन्तु खोजी प्रवृत्ति और सामूहिकता को बहुत अच्छी तरह प्रस्तुत किया है।

किताब की शीर्षक कहानी ‘चमनलाल के पायजामे’ में उमरिया के छोटे से कस्बाई बाज़ार का चित्रण बहुत ही सुन्दर ढंग से किया गया है। इससे वो छोटा सा बाज़ार बड़ा लगने लगता है। सारी दुकानें, उनकी आवाज़ें हमारे सामने घटित होते किसी नाटक सी लगती हैं। कहानी में एक तरफ बूढ़े दर्जी अल्लाब्ख्श हैं जिनकी अब काम करने की उम्र नहीं रह गई पर बच्चों के नाकारापन के कारण अभी भी गृहस्थी की गाड़ी खींचनी पड़ रही है।

दूसरी तरफ नगरसेठ के रुतबे वाले व्यापारी चमनलाल हैं जिन्होंने अल्लाबख्श को अपने पायजामे सिलने को दिये हैं। बूढ़े अल्लाबख्श से गलती हो जाती है। ये शायद उनकी एकमात्र गलती रही होगी, वे पायजामे में चेन की जगह बटन लगा देते हैं। चमनलाल, अल्लाबख्श पर बेहद नाराज़ होते हैं और किसी तरह का लिहाज न करते हुये उनके मुंह पर पायजामे फेंकते हुये यह कह देते हैं कि ‘मुझे मेरा कपड़ा वापस चाहिए।‘

कहानी का अंतिम पैरा बहुत ही मार्मिक है। बाबूजी ने अल्लाबख्श से पायजामे खरीद लिए ताकि वे चमनलाल को नया कपड़ा दे सकें। लेकिन बाबूजी ने वे पायजामे कभी नहीं पहने। उनको पायजामों की जरूरत नहीं थी। सचमुच यह बहुत ही संवेदनशील कहानी है। बिना ज्यादा कुछ कहे, बाबूजी जैसे साधारण आदमी का बड़ापन बता जाती है यह कहानी। यहाँ अल्लाबख्श की मदद उसके आत्म सम्मान को बचा लेने की कवायद है, महानता दिखाने की नहीं।

‘लंगड़ा गुड्डा की छलांग’ सामाजिक ताने- बाने का एक अलग ही सुंदर वृत्तान्त है। इसमें जीवन का रंग है, त्योहार है, किशोर हैं, बड़े बुजुर्ग भी हैं और सब अपने ठेठ देसीपन मे व्यक्त हुये हैं। बच्चों की तैयार की गई होली से लिटगिनियाँ चोरी हो जाने की घटना का पल दर पल इतना जीवंत वर्णन है कि हम कहानी के साथ बस बहे चले जाते हैं। लंगड़ा गुड्डा जिस तरह की तरकीब भिड़ाता है वह कहानी का बहुत ही रोचक हिस्सा है।

संग्रह की सबसे अनूठी कहानी ‘पंडित गोरेलाल रबड़ीवाले’ है। इसमें कहानी से भी ज्यादा एक खामोश रुदन है, आवाजहीन प्रलाप है। कस्बे के गोरेलाल अपने पारंपरिक और देशज ज्ञान व हुनर से रबड़ी बनाकर बेचने का काम करते हैं। रबड़ी जो सबकी जान है और गोरेलाल जी की पहचान है। रबड़ी बेचने के लिए मुहल्ले मे फेरी करते हुये वह एक कर्णप्रिय और विशिष्ट टेर लगाते हैं। लेखक ने कहानी मे इस टेर का बहुत ही सुंदर वर्णन किया है। ईया... रबड़ी... मलया....। कहानी में ध्वन्यात्मक प्रभाव पैदा करते हुये बहुत खूबसूरती से लिखा गया कि ‘कोई दो तीन डग तक तो जरूर चलती रही होगी उनकी टेर’। उनके गुजर जाने के बाद उनकी यह खास टेर चली जाती है और वह स्वादिष्ट रबड़ी भी फिर कभी चखने को नहीं मिली। कोई उनका यह हुनर अपना नही पाता। संग्रह की यह सबसे छोटी कहानी है लेकिन प्रभाव में सबसे बड़ी। उसमें उठने वाला सवाल आजका सबसे बड़ा सवाल है। कहानी के अंत तक पहुँचते हुये लगता है कि रबड़ी सिर्फ एक मिठाई नहीं है वह एक कला है, परंपरा है जिसे आगे बढ़ाने वाला कोई नहीं मिला। पिछले समय मे हमारे घरों से, हमारे समाज से कई सारी नमकीन और मीठी चीजें गायब होती चली गई हैं। बाज़ार ने लड्डू की जगह चॉकलेट खाने का प्रलोभन दिया है।

इन सारी कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता यह लगी कि इनमें से कोई भी कहानी ज़ोर- ज़ोर से या चीख- चीख कर उसका उद्देश्य नहीं बताती। बिलकुल चुपचाप रहते हुये कथ्य प्रकट कर गुज़र जाती है। यही कलात्मकता और सादगी इन कहानियों को विशिष्ट व हृदयग्राही बनाती हैं। कहानी का कोई उद्देश्य होना चाहिए या नहीं, इस प्रश्न को उठाने से पहले हमें यह जरूर अनुभव करना चाहिए कि यदि लेखक को किसी बात ने बहुत गहरे छुआ है, प्रभावित किया है, उसमें उसे विलक्षणता नज़र आती है तो यही वह अनुभूति तीव्रता है जिसे बाद में पाठक कहानी की सोद्देश्यता से जोड़ते हैं।

कहानियों में ऐसे चरित्र हैं जो मनुष्यता की बात करते हैं और वह भी बिना बोले। वे किसी प्रकार की हिंसा के पक्ष में नहीं हैं। वे सब निश्छल हैं, इंसानियत से भरे हुये हैं, तमाम राग द्वेष के बाद भी। कहानियों का यह पक्ष भी बहुत प्रभावित करता है कि इसमें जो समय और चारित्रिकता है, वह आज के समय में नहीं बचा है। उसे सँजोया जाना चाहिए ताकि मनुष्यता की उम्मीद बनी रहे। ये सारी कहानियाँ मनुष्यता के पक्ष में हमारी दृष्टि को ले जाती हैं।

हेमंत देवलेकर

28 जुलाई, भोपाल