A SHORT STORY

धनीराम के दद्दा

धनीराम के दद्दा। नाम ही काफी था उन दिनों। पांच फुट की नाटी गठीली काठी। घनी काली नोकदार गलमुच्छ। फौजीकट बाल। हाफ बांह की मोटी खद्दर वाली शर्ट और ऊपर से नीचे बराबर चौड़ाई वाला फुलपेंट। चलने पर चर्र-चूं बोलने वाली खालिश चमड़े की पनहीं पहनकर, एक कांधे पर गमछा डाले और दूसरे पर अपनी पुरानी भरमार बन्दूक टाँगे, धनीराम के दद्दा जब अपनी ठाठ बाट से घर से निकलते तो बच्चे जरूर गली छोड़ किनारों पर दुबक लेते।

वैसे तो उनका नाम रामसेवक बर्मन था। उनके बडे़ बेटे का नाम धनीराम था। जिसकी वजह से सब उन्हें धनीराम के दद्दा कहते थे। उमर कोई 50-52 साल। उमरिया की एसडीएम कोर्ट में अर्दली थे। एक तहसील में एसडीएम सबसे बड़ा और रौबदार अधिकारी हुआ करता है सो इस लिहाज से धनीराम के दद्दा भी कम रौबदार न थे। उनकी ड्यूटी थी कोर्ट की ड्योढ़ी पर खड़े होकर बाहर की तरफ मुंह कर के जोर से पुकार लगाना - ‘रामबकस कोल, वल्द पुनउआं कोल, साकिन पठारी खुर्द, हाजिर हो ओ ओ ओ ऽ ऽ ऽ। आधा किलोमीटर तक तो जरूर जाती रही होगी उनकी आवाज। दमदार और बुलंद आवाज। उमरिया तहसील में दीवानी और फौजदारी मामलों की सुनवाई के लिए गांवों से हर रोज सैकडो़ की तादाद में लोग आते और दिन दिन भर अपनी बारी का इन्तजार करते बैठे रहते। कोई किसी चाय की गुमठी में बैठा है, कोई गांधी चौक की तरफ निकल गया है, कोई सब्जी हाट की तरफ, कोई कोर्ट परिसर के पीछे की तरफ झाड़ियों में फारिग हो रहा है, तो कोई कालरी स्कूल मैदान में पेड़ तले झपकी ले रहा है। धनीराम के दद्दा की पुकार में वो कमाल था कि लोग कहीं से भी दौड़कर अपने मुकद्दमें की पेशी में हाजिर हो जाते। कोर्ट की ड्यूटी के समय, शासन की तरफ से मिले सफेद खद्दर की शर्ट और पेंट पहनते। काले पालिशदार जूते और कांधे से कमर तक तिरछा लाल पट्टा जो अंग्रजों के जमाने से चला आ रहा था। जेब पर टंकी हुई चमकदार पीतल की पट्टी, जिस पर लिखा होता रामसेवक बर्मन।

अपनी ड्यूटी बजा, थोड़ी मोहलत मिलने पर सामने वाली गुमठी में आ जाते। तम्बाकू चूने की डिबिया निकालते, मलते और फक्का मारकर फिर वापस ड्योढ़ी पर तैनात हो जाते। वैसे तो बड़े मजाकिया ओर मसखरे आदमी थे, पर मजाल कि कोर्ट परिसर में कोई उनके साथ जरा भी हंसी ठिठोली कर ले। एकदम सैनिकों की तरह तनकर डटे रहते और थोड़ी थोड़ी देर में अपनी मूछों पर ताव देना न भूलते।

ये धनीराम के दद्दा का एक रंग था। जिसमें वे एसडीएम कोर्ट के अर्दली रामसेवक बर्मन‘ज्यादा थे। पर उनका एक दूसरा रंग भी था। उनका दूसरा रंग कम रोचक न था।

सुबह पांच बजे उठकर वे नदी पर जाते। घुटनों के ऊपर तक गमछे की लुंगी और लट्ठे की बण्डी पहने, कांधे पर तौलिया डाले। एक हाथ में कांसे का लोटा तो दूसरे हाथ में मच्छी पकड़ने की बंसी। तड़के ही नदी में लमडोर डालकर किनारे सरकंडों के बीच बंसी गाड़ देते और लोटा भरकर झाड़ियों में निकल जाते, फारिग होने। लौटकर बंसी टटोलते। फिर घंटे दो घंटे चुपचाप किनारे पर बैठकर मच्छी मारते और झोले में इकट्ठा कर रख देते। फिर नहा धोकर मच्छी लिए घर लौटते। यह उनका सुबह शाम का तयशुदा काम था। कभी कभी भरमार बन्दूक का धमाका भी कर देते थे मच्छी मारने के लिए। यह उनका शौक भी था, नशा भी और शगल भी। नदी से बड़ा याराना था उनका। सुबह 2- 3 घण्टे और शाम को 2- 3 घण्टे नदी में ही गुजरते। धनीराम के दद्दा थे तो अंगूठा छाप पर कोर्ट कचहरी के काम के बड़े जानकार। लोग उन्हें ढूंढते हुए नदी पर ही आते थे। एक और खासियत थी उनकी। वे मोच खाये, लचके हुए हाथ -पैरों की नस और हड्डी बिठाना भी जानते थे। इस लिहाज से भी उनकी बड़ी पूछ परख थी। सरसों के तेल की एक शीशी उनके बाहर वाले दरवाजे से सटे आले में रखी ही रहती। वहीं आंगन में एक तखत रखा रहता, जिस पर बिठाकर वे पीड़ितों की सेवा करते।

घर खस्ताहाल था। मामूली पगार थी। परिवार बड़ा और लड़के बेकार। पर धनीराम के दद्दा इस सेवा के एवज में किसी से एक धेला न लेते थे। नदी से लौटते वक्त चूल्हे के लिए सूखी लकड़ियां बटोर कर लाना न भूलते।

एक देखा हुआ मंजर मुझे धनीराम के दद्दा का जीवट और कद्दावर व्यक्तित्व भूलने नहीं देता। उनका टोला नदी की टेकरी पर था। बस नीचे उतरते ही घाट। उन दिनों हर साल ही नदी पूर पर आती थी और वह देखने लायक होता। नदी आने की खबर बस्ती में आग की तरह फैलती और नदी की तरफ लोगों का तांता सा लग जाता था। जुलाई का महीना था। मैं कोई 11-12 साल का रहा होऊंगा। तीन रोज से बारिश हुयी जा रही थी। नदी अपनी शान पर थी, उफान पर थी। जनाना घाट की सात सीढ़ियां डूब चुकी थी, अभी पांच सीढ़ियां बाकी थीं। फिर हनुमान चबूतरा, उसके बाद उनकी अर्धलेटी घी रोली पुती आदमकद प्रतिमा और फिर शिव पार्वती मंदिर। यह था नदी की बाढ़ का मीटर। लोग बतिया रहे थे, ’हनुमान जी के पैरों तक आ गयी है।’ फिर, ’अब हनुमान जी का सिर्फ मुकुट बचा है। अब तो शिव मंदिर का नंदी डूब चुका है।’ यह अधिकतम स्तर होता, क्योंकि मंदिर टेकरी पर था।

दोपहर का वक्त था पर मूसलाधार बारिश और बादलों के अंधियारे की वजह से शाम का गुमां हो रहा था। लोग नदी की तरफ भागे जा रहे थे। हनुमान जी पूरे डूब चुके थे। डर भी था कौतूहल भी। कोई छाता लगाये, कोई पन्नी ओढ़े, कोई बस भीगता हुआ। मैं भी पीछे लग गया। टेकरी पर पहुँचने के पहले ही मैंने नदी का शोर सुना। सायं सायं, भायं भायं, हरहराती हुयी नदी का ऐसा विकराल रूप मैंने सोचा भी न था। नजर थम सी गयी और आंखें फैल गयीं। लोगों का हुजूम सा था, इस किनारे भी और उस किनारे भी। गंदला, मटियाला पानी, दूर नीम घाट से चौड़ा होता हुआ एक घुमाव लेता हुआ, गौतमान घाट में सब कुछ डुबाये हुए बस बहा चला जा रहा था। उसके साथ बहे आ रहे थे पेड़, डगालें और झाड़ियां। बाढ़ बढ़ती जा रही थी, लोग पीछे हटते जा रहे थे। नैगमां टोला में कुम्हारों के घर बह जाने का खतरा सा लग रहा था। तभी मेरी नजर टीले के नीचे आधे से ज्यादा डूबे हुए करंजी के झाड़ पर पड़ी। उसकी एक मोटी डगाल से अपनी कमर पर रस्सी बांधकर धनीराम के दद्दा खड़े थे। उनके बदन पर सिर्फ पट्टे वाली जांघिया थी। हाथों में एक मोटा रस्सा लिए वे उसे फेंककर, उसके सहारे बड़े बड़े लट्ठों को किनारे खींच ला रहे थे। बहुत ही खतरनाक था यह काम। पर धनीराम के दद्दा इसे पूरे मजे में कर रहे थे। लोग चिल्ला रहे थे। पानी बढ़ रहा है। पेड़ टूट भी सकता है। पानी का बहाव सबकुछ बहा ले जाने पर आमादा था। पर धनीराम के दद्दा पर तो जैसे जुनून सवार था। पेड़ के पेड़ उखड़कर बहे चले आ रहे थे। धनीराम के दद्दा रस्सा फेंककर उन्हें फंसाते और किनारे खींच लाते, फिर रस्से से ही बांधकर अगले लट्ठे की जुगत में लग जाते। एक बारगी धनीराम के दद्दा ने रस्सा फेंका और अचानक एक झटके में डगाल से छिटक गये। उस भयावह विशाल भरभराते पानी में धनीराम के दद्दा का सिर किसी छोटे कद्दू सा दिखा और फिर गायब हो गया। लोग चिल्ला रहे थे, धनीराम के दद्दा गये - धनीराम के दद्दा गये। मैं डर गया और घर की तरफ भागा। दिल जोरों से धड़क रहा था। मैंने जाना धनीराम के दद्दा डूब गये, मर गये। पर दूसरे रोज सुबह पता चला वह तो उनकी मस्तीखोरी थी। जब जी भर के लट्ठे जमा कर लिए तो उफनाती नदी में कूदकर थोड़ा कारनामा दिखाया और पानी के साथ बहते, तैरते हुए फजिलगंज घाट में बरगद के सहारे बाहर निकल आये।

बारिश थमी, पानी उतरा। बादल छंटे, धूप निकली। धनीराम के दद्दा के फंसाये हुए लट्ठे किनारे पर पड़े सूखते रहे। एक इतवार को मैंने देखा दोपहर में धनीराम के दद्दा, कुल्हाड़ी से लट्ठे चीर रहे थे। उनका सांवला बदन धूप में चमक रहा था।

अनिल सिंह